डॉ. आंबेडकर की पूजा करते लोगों की तस्वीरें देखकर आप झल्ला क्यों जाते हैं?

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इसे मैं पूजा नहीं मानता बल्कि ब्राह्मण संस्कृति के नकार के प्रतीक के रूप में अपने एक वास्तविक मुक्तिदाता को किसी महत्वपूर्ण अवसर पर स्मरण करने के तरीके की तरह देखता हूं.

मोहन आर्या

फोटोः मोहन आर्या की फेसबुक प्रोफाइल से साभार

सोशल मीडिया पर कभी-कभी ऐसी तस्वीरें दिख जाती हैं जिनमें लोग बाबा साहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर की तस्वीरों की पूजा करते नजर आते हैं. हालांकि आजकल सोशल मीडिया की उन तस्वीरों की सत्यता को लेकर बहुत सटीक कुछ कहा नहीं जा सकता कि वे असली हैं या मैनीपुलेटेड हैं. फिर भी विमर्श तो होनी ही चाहिए. एक मकान की तैयार हो रहे नींव के पास बाबा साहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर की पूजा ( संभवतः भूमि पूजन) कर रही महिला की यह तस्वीर सोशल मीडिया पर कई जगह देख चुका हूं. कई लोग जो प्रोफाइल से आंबेडकरवादी हैं, इस तस्वीर को आंबेडकर की महानता के रूप में पेश करते हुए इस महिला की आंबेडकर के प्रति आस्था की प्रशंसा कर रहे हैं, कई लोग इसे एक मूर्खतापूर्ण कृत्य कहते हुए इसे आंबेडकर को भगवान बनाना कह रहे हैं. उनका यह भी कहना है कि आंबेडकर को पूजने वालों ने उनके विचारों का सत्यानाश कर दिया है.

पिछले काफी समय से खासतौर से बामसेफ और कांशीराम की सामाजिक गतिविधियों के परिणाम के बतौर कई जगह से ऐसी खबरें आती हैं कि दलित समुदाय के लोग वैवाहिक कार्यक्रम में आंबेडकर की प्रतिमा की शपथ लेते हैं या उसके चारों ओर फेरे लेते हैं आदि-आदि. मेरे व्यक्तिगत विचार में यह कृत्य आपत्तिजनक या मूर्खतापूर्ण बिलकुल नहीं हैं. जो भी लोग ये सब करते हैं, वे दलित समुदाय के आम लोग हैं जिनकी कोई कैडर वाली ट्रेनिंग नहीं है. ना ही आंबेडकरवादी ऐसी कोई ट्रेनिंग देते हैं. इस महिला को आंबेडकर के विषय में अगर पता नहीं होता या ये उनके प्रति किसी भी कारण से अपने को कृतज्ञ महसूस नहीं कर रही होतीं, तो ये अपने घर की नींव रखते समय क्या भूमिपूजन नहीं कर रही होती? अगर कर रही होती तो आंबेडकर की जगह किसकी तस्वीर होती? वह किस विधान से पूजन कर रही होतीं? क्या कोई पूजा कराने वाला पुरोहित भी वहां होता? इन सवालों के जवाब सोचिये तो ब्राह्मण पद्धति से भूमिपूजन आपको एक सामान्य-सी बात लगेगी और आप इसे मूर्खतापूर्ण नहीं मानेंगे. अगर आप तब भी इसे मूर्खतापूर्ण मानते हैं तो आप अपने बारे में सोचिये आपके खुद के सारे संस्कार किस विधि से हुए हैं? हो सकता है आप नास्तिक हों लेकिन आप सांस्कृतिक रूप से क्या हैं? आप कौन से तीज त्यौहार मनाते हैं?

एक बात हमें समझनी चाहिए. वह यह कि मानवशास्त्र मनोविज्ञान और संस्कृति की सामान्य समझ कहती है कि संस्कार विधि का सामाजिक जीवन में अपना एक महत्व है. अन्यथा क्या कारण हैं कि ब्राह्मण धर्म द्वारा हमेशा से हर तरह से तिरस्कार पाए लोग किसी न किसी रूप में उसी की रीतिरिवाजों से चिपके हुए हैं. इसका जवाब यह है कि उनके पास कोई विकल्प नहीं है. अगर उनके घर बच्चा पैदा हो तो किसी न किसी विधि से नामकरण करना होगा. अगर कोई मृत्यु हो तो अंतिम संस्कार की कोई न कोई विधि रहेगी ही.

चूंकि दलित समुदाय की एक गहरी और अद्वितीय समस्या रही है-संस्कृतिविहीनता की समस्या. पहले अपनी कोई स्वतंत्र संस्कृति नहीं होने के कारण वे दुत्कारे जाने के बावजूद भी ब्राह्मण संस्कृति को अलग से अपनाता है. यही समस्या डॉ. आंबेडकर को खुद भी बौद्ध धम्म तक ले गई थी. जब डॉ. आंबेडकर बुद्ध को प्रणाम करते हैं तो इसे मूर्खतापूर्ण कहना अपनी खुद की मूर्खता को जाहिर करना है. यही बात इस महिला के मामले में भी लागू होती है. पूर्ण रूप अधार्मिक नास्तिक और भौतिकवादी होने के बावजूद मैं इस महिला को मूर्ख नहीं कहूंगा. हां, मैं इस प्रवृति को बहुत अधिक प्रोत्साहित करने के पक्ष में नहीं हूं. लेकिन इसे मैं पूजा नहीं मानता बल्कि ब्राह्मण संस्कृति के नकार के प्रतीक के रूप में अपने एक वास्तविक मुक्तिदाता और भौतिक पुरखे को अपने जीवन के किसी महत्वपूर्ण अवसर पर स्मरण करने के तरीके की तरह देखता हूं और ऐसे ही समझता हूं.