परीयेरूम पेरुमलः जातिगत उत्पीड़न और दलित प्रतिरोध की झकझोर देने वाली कहानी

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परीयेरूम पेरुमल को काफी सराहना मिली और पुरस्कार भी मिल चुके हैं. अब उसे क्रिटिक्स च्वाइस फिल्म अवार्ड्स में बेस्ट तमिल फिल्म का पुरस्कार भी मिल गया है. पिछले साल सितंबर में रीलीज हुई यह फिल्म लॉ कॉलेज में पढने वाले एक दलित युवा की कहानी है

सरोज कुमार

परीयेरुम पेरुमल फिल्म का पोस्टर (साभारः ट्विटर)

क्या किसी पशु की भी जाति हो सकती है? ब्राह्मणवादी जाति व्यवस्था के नजरिए से तो बेशक हो सकती है! तमिल फिल्म परीयेरूम पेरुमल का ओपनिंग दृश्य ही झकझोर कर रख देता है. फिल्म में दलित जाति का नायक परीयेरूम पेरुमल और उसके साथी एक छोटे-से तालाब के मटमैले पानी में अपने पालतू कुत्तों को नहा रहे होते हैं. कथित ऊंची जाति के लोगों को आता देख पेरुमल अपने साथियों को लेकर वहां से आगे बढ़ जाता है. पेरुमल जानता है कि उन ऊंची जाति के लोंगों को पेरुमल और उसके साथियों को वहां बैठना-नहाना रास नहीं आएगा तथा लड़ाई-झगड़ा करेंगे. पेरुमल झगड़ा-झंझट से बचना चाहता है. लेकिन क्या सवर्णों की कुंठा से इस तरह बचा जा सकता है? सवर्ण उन्हें सबक सिखाने की बात कहते हैं. थोड़ी दूर जाने पर पेरुमल को पता चलता है कि उसकी प्यारी कुतिया करुपी नहीं दिख रही. उन्हें उन सवर्णों पर शक होता है और ट्रेन की आवाज सुनकर उन्हें खतरे का अंदेशा हो जाता है. पेरुमल पटरियों की ओर चिल्लाता हुआ दौड़ पड़ता है. लेकिन तब तक देर हो चुकी होती है. करुपी पटरियों पर बंधी नजर आती है और ट्रेन उसके टुकड़े करता हुआ निकल जाता है. यह दर्दनाक दृश्य हिला कर रख देता है. इसे देखते हुए हरियाणा का मिर्चपुर याद आ जाता है. वह हत्याकांड हमारे जेहन से कैसे मिट सकता है, जिसमें महज दलित समुदाय के पालतू कुत्ते के भौंकने की वजह से एक 70 वर्षीय बुजुर्ग और 17 साल की अपाहिज लड़की को जिंदा जला दिया गया था. इस फिल्म में पेरुमल के लिए करुपी हमेशा एक मेटाफर (रुपक/प्रतीक) की तरह पूरी फिल्म में घूमती रहती है.

फिल्म स्वर इसी शुरुआती दृश्य के साथ स्पष्ट नजर आने लगता है. पेरुमल एक साथी पूछता है कि हम कब तक चुप रहेंगे. तो जवाब मिलता है, “उस दिन तक जब तक तुम्हारे और मेरे पिता उनकी (सवर्णों) जमीन पर काम करना बंद न कर दें.”

फिल्म की एक खासियत यह है कि इसको देखते हुए देश में घटे कुछ असल घटनाएं बरबस याद आ जाती हैं. मसलन मिर्चपुर के अलावा रोहित वेमुला की सांस्थानिक (आत्म)हत्या जैसी घटना दिमाग में कौंधने लगती है. दरअसल, पेरुमल अपने छोटे-से गांव से निकलकर तेरुनेलवेली शहर के सरकारी लॉ कॉलेज में एलएलबी करने जाता है. एडमिशन के दौरान प्रिंसिपल को पहली मुलाकात में ही जब पता चलता है कि पेरुमल की ख्वाहिश डॉ. आंबेडकर की तरह बनने की है, तो वह अपने चपरासी से पेरुमल की फाइल में नोट करने का निर्देश देता है. यह कहते हुए, “इसके जैसे लड़के जल्दी की किसी झगड़े में पड़ेंगे.”

फिल्म भाषायी समस्या को भी बड़ी गहराई से उठाती है. लॉ कॉलेज में अंग्रेजी में पढ़ाई होती है और पेरुमल को अंग्रेजी नहीं आती. दसवीं और बारहवीं में अंग्रेजी के सिवाय बाकी विषयों में (तमिल माध्यम से) बहुत अच्छे मार्क्स लाने वाले पेरुमल को लॉ कॉलेज का अंग्रेजी का प्रोफेसर कहता है, “तुम यहां अंडे देने आए हो क्या? सूट पहन कर गाय चराओगे क्या? आरक्षण (कोटा) के जरिए आ जाते हो तुम लोग.” जाहिर है, जातिगत और व्यवस्थागत टॉर्चर सिर्फ शारीरिक नुक्सान पहुंचा कर नहीं किया जाता, बल्कि मानसिक तरीके का जो टॉर्चर दिखाया गया है, वह बहुत कनेक्ट करता है. पेरुमल का आक्रोश फूट पड़ता है.

फिल्म का पोस्टर (साभारः ट्विटर हैंडल)

पेरुमल की मुसीबतें तब और बढ़ जाती हैं, जब कथित ऊंची जाति से आने वाली अपनी सहपाठी ज्योति महालक्ष्मी उर्फ ‘जो’ से उसकी दोस्ती होती है. जो पेरुमल को अपनी बड़ी बहन की शादी में आमंत्रित करती है. जो के परिजनों के उच्च जातिय दंभ को चोट पहुंचती है कि आखिर निची जाती का शख्स उसके घर की बेटी से दोस्ती कैसे कर सकता है. जब पेरुमल शादी में जाता है तो उसे धोखे से एक कमरे में बंद कर खूब बुरी तरह से पिटा जाता है. उस पर पेशाब किया जाता है. इसके बाद का एक गीत बहुत मार्मिक है और पेरुमल को करुपी की याद आती है. उस गीत के बोल कुछ ऐसे हैं, “मैं वह हूं, जिसके ऊपर ट्रेन चढ़ा दिया जाता है, वह हूं जिसे पेड़ों पर फांसी से लटका दिया जाता है, जिसे जिंदा झोपड़ी में जला दिया जाता है.” गीत में ब्लू रंग और खून के धब्बों जैसे रूपकों का प्रभावी प्रयोग है.

जो को यह सब पता नहीं होता और उसका पिता पेरुमल को जो से दूर रहने की हिदायत देता है. पेरुमल भी उससे दूर रहने की कोशिश करता है औऱ बातचीत बंद हो जाती है. लेकिन व्यवस्थागत जातिगत उत्पीड़न से बचना इतना आसान नहीं है. क्लास में जब जो का सहपाठी चचेरा भाई पेरुमल को आगे की बेंच से हटने कहता है और पेरुमल मना करता है, तो उस पर जानलेवा हमला करके उसे मारने की कोशिश होती है. किसी तरह पेरुमल भाग कर अपनी जान बचाता है. पेरुमल को धक्का देकर महिला शौचालय में लड़कियों के बीच बंद करके मानिसक तौर पर टॉर्चर किया जाता है. ये सारे दृश्य हिलाकर रख देते हैं. वह दृश्य तो और ही दर्दनाक है जिसमें पेरुमल के पिता (वे ग्रामीण नर्तक हैं और उसी से अपनी आजीविका कमाते हैं) को ऊंची जाति के छात्र सबके सामने नंगा करके टॉर्चर करते हैं.

फिल्म में एक और एकदम घुटा हुआ खलनायक चरित्र है- थाता. वह एक हत्यारा है और ऑनर किलिंग तो वह बिना पैसे के करता है क्योंकि उसे लगता है कि यह वह अपने समाज या ईश्वर के लिए कर रहा है. उसे ही पेरुमल को मारने की सुपारी दी जाती है. वह पेरुमल को घायल करके ट्रेन की पटरियों पर रख देता है, ठीक उसी तरह जैसे करुपी को रखा गया था. पर पेरुमल को ट्रेन आने से पहले होश आ जाता है, वह किसी तरह ट्रेन से बच जाता है. जो के पिता और दो अन्य रिश्तेदार देखने जाते हैं कि वह मरा या नहीं. उसे जिंदा देख उस पर फिर हमला करते हैं. पेरुमल किसी तरह उनका सामना करता है और भयानक मारपीट होती है. पेरुमल उन्हें बुरे हाल में ही पस्त कर देता है और जो के पिता के कार के शीशे को पत्थर से फोड़ते हुए उससे कहता है, “आप इंसान हैं या नहीं. इतना करने के बाद भी आपका क्रोश शांत नहीं हुआ. यही आपकी वीरता है? अपको लगता है कि आप सम्मान के रक्षक हैं. रक्षक आप नहीं मैं हूं. उसे अगर मैंने यह सब आपकी बेटी को बता दिया होता तो उसने आपके मुंह पर थप्पड़ मारा होता और फांसी लगा ली होती. अगर आपको लगता है कि आप मुझे मार कर उसके वैसे पिता बन सकते हैं, जैसा जो आपको समझती है. तो आइए मारिए मुझे.” पेरुमल फिर कहता है, “आपको पता है कि मैं आपसे बड़ा क्यों हूं. क्योंकि मेरे हाथों ने हल पकड़ा है तो मैंने तलवार भी बनाई है. बस इसलिए मैं यही रहूंगा. जो मुझे पसंद है वहीं पढ़ूंगा. कर लीजिए जो आप कर सकते हैं.” जो का पिता सन्नाटे में आ जाता है और वहां से अपने घायल रिश्तेदारों को लेकर वापस चला जाता है.

फिल्म के आखिरी दृश्य में जो का पिता कॉलेज आता है और जो तथा पेरुमल के साथ बैठा है. जो को पेरुमल पर हमले के बारे में कुछ नहीं पता है. जो के चचेरे भाई से उसका पिता पेरुमल के हाथ मिलवाकर पैच अप करवाता है. जब जो कुछ खाने की चीज लाने जाती है तो उसका पिता पेरुमल से माफी मांगते हुए कहता है, “तुम एक अच्छे इंसान हो. जो तुम चाहते हो सब बनोगे. अच्छे से पढ़ना. अभी के लिए यहीं बोल सकता हूं. देखते हैं, कल चीजें बदल सकती हैं. हैं ना? किसे पता.” तो पेरुमल का जवाब होता है, “जब तक आप लोग वैसे बने रहेंगे और उम्मीद करेंगे कि मैं वह कुत्ता बनूं जो आप बनाना चाहते हैं, तब तक कुछ नहीं बदलेगा. सब कुछ वैसा ही रहेगा.”

फिल्म इस संदेश और उम्मीद के साथ खत्म होती है कि चीजें तब तक नहीं बदलेंगी जब तक कि कथित ऊंची जातियों के लोग नहीं सुधरेंगे. जाहिर है, यह विमर्श का विषय हो सकता है कि कथित ऊंची जातियों के लोगों का वाकई हृदय परिवर्तन सरीखा कुछ होगा. वैसे यह परिवर्तन भी तभी हो सकता है जब दलित प्रतिरोध मजबूत हो और सवर्णों को आखिरकार उसके सामने अपना दंभ छोड़ने को मजबूर होना पड़े. वरना समाज में कब्जा जमाए लोग तो हमेशा अपनी सत्ता बनाए रखने की कोशिश ही करते हैं.

कुल मिलाकर, यह बेहद महत्वपूर्ण फिल्म प्रतीत होती है और अपने स्वर में इस विषय पर हाल में बनी फिल्मों से अलग नजर आती है. सैराट की तरह इसका कथानक केवल अंतरजातीय प्रेम के इर्द-गिर्द नहीं घूमता. हालांकि यह काला की तरह ताकतवर दलित/वंचित जनता (मास) में तब्दील नहीं होता जिसमें हर शख्स प्रतिरोध करता ‘काला’ में बदल जाता है. लेकिन युवा दलित, कॉलेज का कथानक और प्रेम, इन सबको मिलाकर आज के युवा दलित तथा क्रूर उत्पीड़न के खिलाफ उसके आक्रोश-प्रतिरोध को इसमें प्रभावी स्वर मिला है. कुछ दृश्य और संवाद तो बेहद प्रभावी हैं. पेरुमल के रूप में अभिनेता कथिर ने अलग-अलग सिचुएशन्स के मुताबिक बहुत बढ़िया अभिनय किया है. निर्देशक मारी सेल्वराज की इस फिल्म को पा. रंजीत ने प्रोड्यूस किया है. फिल्म अमेजन प्राइम वीडियो पर भी उपलब्ध है और अंग्रेजी तथा हिंदी सब-टाइटल होने के वजह से सहज तरीके से देखी जा सकती है. यकीनन, यह मस्ट वॉच फिल्म है.

(लेखक फ्रीलांसर हैं तथा जामिया मिल्लिया इस्लामिया से दलित और न्यू मीडिया पर रिसर्च कर रहे हैं.)