बिहार में इंसेफलाइटिस से पिछले दस साल में 1,700 से ज्यादा मौतें

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बिहार में इंसेफलाइटिस की वजह से इस साल 16 जून तक 127 बच्चों की मौत हो चुकी है और यह सिलसिला बढ़ता जा रहा है. बिहार में साल 2009 से लेकर 2014 तक इससे करीब 1,300 मौत हो चुकी थीं. जाहिर है, सरकार इसके रोकथाम के उपाय करने में नाकाम रही है.

सरोज कुमार

एसकेएमसीएच में जमीन पर इंसेफलाइटिस पीड़ित बच्ची का हो रहा इलाज (फोटोः वेद्र प्रकाश)

बिहार के मुजफ्फरपुर में एक्यूट इंसेफलाइटिस सिंड्रोम (एईएस) ने इस साल मई में ही दस्तक दे दी थी. इस साल 18 मई को ही मुजफ्फरपुर के श्री कृष्ण मेडिकल कॉलेज ऐंड हॉस्पिटल (एसकेएमसीएच) में एईएस की वजह से एक बच्चे की मौत हो चुकी थी. लेकिन सरकार और प्रशासन इसके लेकर तब सचेत नहीं हुआ. ऐसे में मौत का सिलसिला लगातार बढ़ता गया. इंसेफलाइटिस का कहर इस बार ऐसा है कि 16 जून तक बिहार में करीब 127 बच्चों की मौत हो चुकी है.

इन मासूमों की मौत से जाहिर है कि सरकार ने इंसेफलाइटिस को लेकर कोई उपाय नहीं किए थे, जबकि करीब मई से ही इसका प्रकोप शुरू हो जाता है. इसके शिकार मुख्य तौर पर 0-14 साल तक के बच्चे होते हैं. साल 1994 से ही मुजफ्फरपुर में इंसेफलाइटिस का अपना कहर बरपा रहा है. 2014 तक आते-आते स्थिति इतनी गंभीर हो गई कि उस साल एईएस से मौतों का आंकड़ा 400 पार कर गया था.

द मेडिकल जर्नल ऑफ इंडिया में 2017 में छपे एक शोध के आंकड़े

बीते दस साल में मौत के भयानक आंकड़े

दैनिक भास्कर, दैनिक जागरण से लेकर अमर उजाला जैसे अखबारों की खबरों के मुताबिक, साल 2010 से 2019 तक राज्य में एईएस के करीब 471 बच्चों की मौत हुई है. लेकिन इनके आंकड़ों के स्रोत स्पष्ट और प्रमाणित नहीं हैं. ऐसे में द नेशनल मेडिकल जर्नल ऑफ इंडिया में 2017 में प्रकाशित प्रवीण कुमार, पीएम पिसुद्दे, पीपी सारथी, एमपी शर्मा और वीआर केशरी के शोध पत्र को देखना महत्वपूर्ण होगा. उनके इस शोध के मुताबिक, बिहार में साल 2009 से 2014 तक एईएस के कुल 4,400 मामले सामने आए हैं और 1,309 मौतें हुई हैं. इस दौरान बिहार में जापानी इंसेफलाइटिस के 396 मामले सामने आए हैं और इससे 56 मौतें हुईं (देखें टेबल). जाहिर है, ये बेहद चिंताजनक आंकड़े हैं.

द हिंदू की 17 अगस्त, 2017 की एक खबर के मुताबिक, साल 2016 में बिहार के गया, मुजफ्फरपुर, पश्चिमी चंपारण और पटना में एईएस के 773 मामले सामने आए थे और उनमें 196 बच्चों की मौत हो गई थी. उसके मुताबिक, 2016 में जापानी इंसेफलाइटिस के भी 145 मामले आए थे और 17 मौतें हो गई थीं. द हिंदू की उसी खबर में बताया गया था कि साल 2017 में जुलाई तक एईएस के 126 मामले सामने आ चुके थे और 30 मौतें हुई थीं. वहीं, दैनिक भास्कर जैसे हिंदी अखबार एईएस से 2015 में 11 और फिर 2018 में भी 11 बच्चों की मौत का आंकड़ा बता रहे हैं.

ऐसे में अगर द नेशनल मेडिकल जर्नल ऑफ के शोध के 2009-14 तक के आंकड़े में इस साल 16 जून तक का आंकड़ा, दि हिंदू के साल 2016 और 2017 का आंकड़ा और फिर भास्कर के 2015 तथा 2018 के आंकड़ों को भी मोटे तौर पर जोड़ लिया जाए तो एईएस व जापानी इंसेफलाइटिस से हुई मौतों का आंकड़ा 17,57 हो जाता है. इससे स्पष्ट है कि 2009 से 2019 (16 जून तक) के दौरान इंसेफलाइटिस से सत्रह सौ से ज्यादा मौतें हो चुकी हैं.

बिहार में इंसेफलाइटिस से पिछले दस सालों में हुई मौतों पर द मार्जिन की पड़ताल (स्त्रोत: विभिन्न रिपोर्ट्स)

मौत के इतने भयानक आंकड़ों के बावजूद सरकार का सचेत नहीं रहना दर्शाता है कि वह अब तक इस जानलेवा बीमारी के प्रति गंभीर नहीं हुई है और बार-बार मासूमों की मौत हो रही है. इस बार फिर जब यह बीमारी अपना कहर बरपा रही है तो क्या सरकार इन आंकड़ों पर नजर डालेगी और बचाव के ठोस उपाय करेगी? बिहार में नीतीश कुमार बतौर मुख्यमंत्री करीब 14 साल से काबिज हैं, वहीं 2014 से केंद्र में नरेंद्र मोदी बतौर प्रधानमंत्री काबिज हैं. अब उन्हें और कितना वक्त चाहिए!

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