वैश्विक सैन्यीकरण के विरोध में एकजुटता और एकता: कश्मीर पर फिलीस्तीनी संगठन बीएनसी का बयान

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फिलिस्तीन समाज के सबसे बड़े गठजोड़- फिलिस्तीन बॉइकाट, डाइवेस्टमेंट एंड सैंक्शंस नेशनल कमिटी (बीएनसी), ने कश्मीर मसले पर कश्मीरियों के साथ एकजुटता जताते हुए बयान जारी किया है. हम उसके बयान का हिंदी अनुवाद यहाँ प्रकाशित कर रहे हैं.

बीएनसी

फिलिस्तीन समाज के सबसे बड़े गठजोड़- फिलिस्तीन बॉइकाट, डाइवेस्टमेंट एंड सैंक्शंस नेशनल कमिटी (बीएनसी), जम्मू एवं कश्मीर से सापेक्ष स्वायत्तता रातों रात समाप्त कर देने के भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाली भारत सरकार के तानाशाही फैसले पर, कश्मीरियों और भारत समेत दुनिया भर की लोकतान्त्रिक ताकतों के रोष और विरोध में सहभागी है. हम वर्तमान भारत सरकार की कश्मीर में इस्तेमाल की जा रही इज़राइली दृष्टिकोण और नीतियों की निंदा करते हैं.

भारत की इस दक्षिणपंथी सरकार ने कश्मीरियों की जानकारी और अनुमति के बगैर, राष्ट्रपति के आदेश से भारतीय संविधान में कानूनी रूप से संशयास्पद संशोधन कर, कश्मीर के लोगों के अंतर्राष्ट्रीय मान्यता प्राप्त अधिकारों का हनन किया है, खासकर अपने भविष्य के बारे में खुद लोकतान्त्रिक तरीके से फैसला लेने के अधिकार का.

भारत सरकार ने यह फैसला 5 अगस्त को लागू किया. इस फैसले को लागू करने से पहले उन्होंने कश्मीर की फ़ोन लाइनें, इन्टरनेट को बंद कर दिया , वहां के राजनीतिक नेताओं को उनके घरों में नज़रबंद कर दिया और सड़कों पर सेना, अर्धसैनिक व पुलिस बलों की तैनाती के ज़रिये कर्फ्यू लगाकर कश्मीर का संपर्क बाकी दुनिया से काट दिया. कश्मीर घाटी पहले से ही दुनिया के सर्वाधिक सैन्यीकृत क्षेत्रों में से है और अब सरकार के इस फैसले को लागू करने के लिए वहां लगभग 10 लाख सशस्त्रकर्मी तैनात हैं. एक सप्ताह से ज़्यादा समय बीत जाने के बावजूद अभी भी कश्मीर में कर्फ्यू और संचारबंदी लागू है. शुक्रवार को श्रीनगर से स्थानीय लोगों के व्यापक विरोध की पहली ख़बर सामने आयीं जिसमें भारतीय सुरक्षा बलों द्वारा आंसू गैस और गोलीबारी के इस्तेमाल की बात पता चलती है. पत्रकारों की अस्पतालों में पैलेट गन से घायल लोगों से मुलाकात से पता चला कि इनमें से कुछ लोग पढ़ने के लिए जाते समय तो कुछ अपने दुकानों में पावरोटी बनाते समय पैलेट गन का निशाना बने थे.

कश्मीर में अत्याचारों और मानव अधिकारों के उल्लंघन का इतिहास नया नहीं है. मानवाधिकार समूहों ने पिछले तीस सालों में कई मामले दर्ज किये हैं. इसमें सशस्त्र बलों को कानूनी प्रतिरक्षा देने के साथ-साथ, न्यायेतर हत्याएं, मनमानी गिरफ्तारियां, यातना, बलात्कार, लोगों को गायब कर दिए जाने, पैलेट गन के इस्तेमाल से आँखे चले जाने, तथा विरोध और लोकतान्त्रिक अभिव्यक्ति को कुचलने के मामले शामिल हैं. कश्मीर को उनकी अपनी आकांक्षाओं और सयुंक्त राष्ट्र द्वारा निर्धारित अधिकारों वाली एक जनता के रूप में देखने के बजाय, दो परमाणु शस्त्रों से लैस देश, भारत और पाकिस्तान के बीच विवाद के रूप में पेश किया जाता है.

अभी 2018 में ही, सयुंक्त राष्ट्र मानवाधिकार उच्चायुक्त ने कश्मीर के हालात पर एक विस्तृत रिपोर्ट जारी की और स्वतंत्र जांच के लिए पहुँच मुहैया कराने की मांग की, हालांकि भारत ने इसे ‘गलतबयानी’ करार देते हुए खारिज कर दिया. फिलिस्तीनी नागरिकों के रूप में, हम सैन्य दमन सह रहे कश्मीर के लोगों के दर्द को गहराई से महसूस कर सकते हैं क्योंकि यह कई मामलों में हमारे ऊपर हो रहे इज़राइली आधिपत्य और नियंत्रण जैसा है. आज मोदी सरकार ने सीधे-सीधे इज़राइल के सेटलमेंट प्रोजेक्ट से प्रेरणा लेते हुए कश्मीर में जनसांख्यिकीय बदलाव लाने की कोशिश की है. भाजपा सरकार के द्वारा लाये गए संविधान संशोधनों ने जम्मू-कश्मीर की जनता के संपत्ति, रोज़गार, आवास आदि को लेकर अपने क़ानून खुद बनाने के हक़ को समाप्त कर दिया है. यह प्रावधान कश्मीरियों के हाथ से जाने से और दिल्ली की सरकार द्वारा निजी निवेश को कश्मीर में आमंत्रित करने से, क्षेत्र की आबादी की संरचना हमेशा के लिए बदल जायेगी. यह कदम, इज़राइल द्वारा कब्ज़ा किये हुए फिलिस्तीन क्षेत्र में अवैध औपनिवेशिक (कोलोनियल) बस्तियों के ज़रिये ‘ज़मीन पर हकीकत’ गढ़ने के उदाहरण से प्रेरित है.

मोदी के नेतृत्व में भारत के नस्लवादी इज़राइल से गहराते रिश्तों और आकर्षण का ताज़ातरीन उदाहरण है कश्मीर में इज़राइल के सेटलर-कोलोनियलिज़म (उपनिवेशी कब्ज़े) का अनुसरण करना. हमने पिछले कई वर्षों में देखा है, भारत इज़राइल के तौर-तरीकों और विचारधारा को अपना रहा है और कश्मीर पर अपना नियंत्रण बनाए रखने के लिए इज़राइल हथियारों का इस्तेमाल कर रहा है. सन 2014 में भारत के तत्कालीन गृह मंत्री राजनाथ सिंह इज़राइलआये थे. तब उन्होंने वहां कहा था कि वह गाज़ा में रह रहे 20 लाख फिलिस्तिनीयों की विद्युत् बाड़ वाली घेराबंदी से काफी “प्रभावित” हैं और भारत और पाकिस्तान के बीच नियंत्रण रेखा पर ऐसी ही बाड़ लगाई जा रही है. भारत इज़राइल हथियारों का सबसे बड़ा आयातक देश है। कश्मीर घाटी में सैन्य उपस्थिति का प्रतीक ‘टवोर राइफल’ और भारत द्वारा कश्मीर के नियंत्रण में इस्तेमाल ‘ड्रोन’, दोनों ही इज़राइल द्वारा निर्मित हैं. भारतीय जवानों को प्रशिक्षित करने के लिए, इज़राइल सैन्य प्रतिनिधि मंडल कश्मीर जाते रहते हैं. बेंजामिन नेतन्याहू सितम्बर में फिर भारत की यात्रा करने वाले हैं तब बड़े हथियार के सौदे फिर से एजेंडे में शामिल होंगे. भारत जो इज़राइल हथियार कश्मीरियों के दमन के लिए इस्तेमाल कर रहें है उनका प्रयोग पहले फिलिस्तीन शरीरों पर किया जा चुका है.

इन्ही कारणों से इज़राइल पर विस्तृत सैन्य प्रतिबन्ध के लिए हमारा अभियान, सीधे कश्मीर के सैन्यीकरण समेत वैश्विक सैन्यीकरण के विरोध से जुड़ा हुआ है. इस गंभीर संकट के समय में हम कश्मीर के लोगों के साथ खड़े हैं. भारत और दुनिया भर में अंतर्विवेकशील ताकतें जम्मू और कश्मीर से सीमित स्वायत्तता हटा लेने वाले इस कदम का विरोध कर रही हैं. हमें कश्मीर पर भाजपा सरकार के द्वारा किये गए इस अन्याय को लेकर चुप नहीं रहना चाहिए। हमारें शोषक एक हैं और हमारा संघर्ष मज़बूत होगा यदि हम एक होंगे.

हम भारत सरकार पर अंतर्राष्ट्रीय दबाव बनाने के लिये मांग करते हैं ताकि वह अंतर्राष्ट्रीय क़ानून के तहत कश्मीर के लोगों को दिए गए अधिकारों का उल्लंघन करने वाला कदम वापस लें और साथ ही कश्मीर के लोगों के अधिकारों को सम्मान और मान्यता दे. हम भारत के भी उन अंतर्विवेकशील लोगों से अपील करना चाहेंगे, जिनके नेताओं ने विश्व में गुट-निरपेक्ष आन्दोलन का नेतृत्व किया था और दक्षिण अफ्रीका में नस्लवाद के खिलाफ लड़ाई लड़ी थी, कि वे भारत और इज़राइल के बीच सैन्य और सुरक्षा गठजोड़ को समाप्त करने की दिशा में काम करें. यह न केवल इज़राइल द्वारा फिलिस्तीनी स्वतंत्रता, न्याय और समानता के दमन में भारत की शर्मनाक सहभागीदारी को समाप्त करेगा बल्कि कश्मीरी लोगों के अधिकारों के संघर्ष और भारतीयों के अन्य सामाजिक और आर्थिक संघर्षों के लिए भी लाभकारी होगा.

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