कश्मीरी पंडितों के लिए कश्मीर वापसी को नए सिरे से विचार करने की जरूरत

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वापसी की कोई भी योजना कश्मीर के विविध इतिहास, पहचान और पीड़ा को दरकिनार कर नहीं बनायी जा सकती, जिसने गये 70 वर्षों में कश्मीर के समाज की रचना की है. इस कल्पना में ज़रूरी है कि कश्मीरी पंडितों के सर्वाधिक शोषित होने के कथानक को पीछे छोड़ा जाये. यह आलेख अल जज़ीरा से साभार.

दीप्ति मिस्री और मोना भान

फोटोः सज्जाद हुसैन ट्विटर अकाउंट

भारत सरकार द्वारा 5 अगस्त 2019 को अचानक अनुच्छेद 370 रद्द कर दिये जाने के बाद से ही कश्मीरी पंडितों की अपनी मातृभूमि कश्मीर घाटी में वापस लौटने की बातें चल रही हैं. अनुच्छेद 370 भारतीय संविधान का वह प्रावधान था, जिसकी वजह से 1947 में आज़ाद हुए भारत के साथ जम्मू-कश्मीर की स्वायत्तता कायम थी. इसके साथ ही अनुच्छेद 35(अ) को भी निरस्त कर दिया गया है, जिसके तहत जम्मू-कश्मीर राज्य के स्थायी निवासी और उनके अधिकार परिभाषित किये जाते थे. अब किसी भी भारतीय के लिए कश्मीर में ज़मीन खरीदने के रास्ते खुल गये हैं.

फ़ैसले के बाद आयी ख़बरों में कई कश्मीरी पंडित -कश्मीर घाटी के मूल हिंदू ब्राह्मण- जो 1990 में अपने घर छोड़ आये थे, जश्न मनाते देखे गये. वे आशावान थे कि अब वे “अपनी शर्तों पर” वापिस लौट सकेंगे. जैसा कि एक पंडित ने बीबीसी से बात करते हुए कहा, ‘हमारा वनवास आज खत्म हुआ…आज जा कर हमें असली आज़ादी मिली है.’

सोशल मीडिया पर कई कश्मीरी पंडित, जिनमें दूसरी पीढ़ी के पंडित भी शामिल हैं, जिनका कश्मीर से रिश्ता कुछेक छुट्टियां बिताने और जन्मभूमि से जुड़ी यादों भर का ही है, वे भी तुरंत इश्तेहार साझा करने लगे जिनमें कश्मीर में ज़मीन खरीदने का प्रचार था. वे इस जानकारी से खुश हुए कि अगर उन्होंने ‘वापस जाने’ और कश्मीर में घर बनाने की कल्पना की तो मोदी सरकार उनका साथ देगी. वही मोदी सरकार, जिसने कश्मीरी पंडितों के पुनर्वासन की मांग को हवा दे कर अपने लिए जनमत बनाया था और सत्ता हासिल की थी.

इस जश्न में तथाकथित राष्ट्रभक्त गैर-कश्मीरी हिंदू मर्द भी शामिल थे, जिन्होंने कश्मीर में प्लॉट खरीदने की ख़्वाहिश के साथ वहां की महिलाओं के साथ संबंध बनाने की बात भी एक ही सांस में कह डाली. यह हास्यास्पद ही जान पड़ता है कि धारा 35(अ) को रद्द करने की मांग के लिए एक तर्क यह दिया जा रहा था कि इसकी वजह से लिंग-भेद और महिला अधिकारों का हनन होता है.
चूंकि, कश्मीर में संचार माध्यम पूरी तरह से ठप कर दिये गये हैं, इस बारे में जानकारी मिलनी मुश्किल है कि वहां के अल्पसंख्यक गैर-प्रवासी कश्मीर पंडित, जो 1990 के काल में भी वहां बने रहे, इस बारे में क्या विचार रखते हैं कि अब कोई भी भारतीय हिंदू जिसके पास पैसा होगा, वह कश्मीर में ज़मीन लेकर बस सकेगा.

ऐसे में यह सवाल वाजिब जान पड़ता है कि क्या धारा 370 और 35(अ) के रद्द हो जाने से एक लाख कश्मीरी पंडित जो 1990 में अपना सुखद जीवन कश्मीर में पीछे छोड़ आये थे, अब ‘अपनी शर्तों’ पर वहां वापस जा सकेंगे. यदि उनका मकसद सिर्फ कश्मीर की मिट्टी पर वापस घर बनाना नहीं, वरन उस सामाजिक-सांस्कृतिक एहसास को वापस पाना है जिसे वे ‘घर’ से जोड़कर देखते हैं, तो जश्न मना रहे कश्मीरी पंडितों को इस पर विचार करना होगा कि हालिया फैसलों से उनके एहसासों का घर सुरक्षित हो रहा है या उस एहसास को ही खंडित किया जा रहा है.

अनुच्छेद 35(अ) रद्द होने के कारण वर्तमान में एक जटिलता पैदा हो गयी है. अनुच्छेद 35(अ), जिसने शुरुआती दौर में कश्मीरी पंडितों को मैदानी इलाके से आने वाले भारतीयों को पछाड़ कर सरकारी नौकरियां हासिल करने में मदद की, वह अब ख़त्म हो चुका है. मौजूदा बदलावों के आलोक में कश्मीरी पंडित अब औपनिवेशक के रूप में देखे जायेंगे. जो कश्मीरी पंडित वापस जाने का सपना संजो रहे हैं, जान लें कि उन्हें पड़ोसी के रूप में नहीं देखा जायेगा. वे जनसांख्यिकी की वह लाठी हैं जिसका इस्तेमाल भारत अपनी औपनिवेशिक परियोजना को पूरा करने के लिए करेगा, जिसका असली मक़सद भारत के एकमात्र मुस्लिम बहुल राज्य को हिंदू बहुल राज्य में तब्दील करना है.

1990 में कश्मीरी पंडितों द्वारा कश्मीर छोड़ने के जो कथानक प्रचलित हैं, उनमें सबसे प्रचलित कथानक है कि सैन्य संघर्ष बढ़ने पर कश्मीरी पंडितों को उनके मुसलमान पड़ोसियों द्वारा ‘खदेड़ा’ गया. इस एक कथानक ने कश्मीरी हिंदुओं को सबसे मज़लूम और प्रताड़ित कौम बनाकर ऐसे पेश किया है, जैसे शोषण सिर्फ उन्हीं का हुआ हो, इससे इतर कोई भी चर्चा या अनुभव गौण हो जाते हैं. कश्मीर के मुसलमानों को भी यातनाएं सहनी पड़ी हैं. आम लोगों को गैर-कानूनी रूप से गिरफ़्तार किया जाता रहा, उन्हें जबरन अगवा कर, बंधक बनाकर रखा गया और उनके सारे राजनैतिक अधिकार, यहां तक कि अपने ऊपर हो रहे शोषण के ख़िलाफ़ विरोध व प्रदर्शन करने के मौलिक अधिकार भी छीन लिए गये.

अब कई लोग वापस कश्मीर लौटने वाले पंडितों के लिए अलग कॉलोनी की मांग कर रहे हैं, संभवतः उन्हें कश्मीरी मुस्लिम पड़ोसी से सुरक्षित रखने के लिए. घर लौटने की इस कल्पना में कश्मीरी हिंदू ऐसे परिवेश में रह रहे होंगे, जहां इंसान को इंसान से मिलने पर डर लगता हो. ये घर नहीं, बल्कि मज़बूत दीवारों और सैनिकों से घिरे शिविर होंगे जहां आसपास मौजूद कश्मीरी मुसलमानों के अस्तित्व को झुठलाने और भुलाने की सतत प्रक्रिया हर पल जारी रहेगी.

घर लौटने की इन कल्पनाओं के आगे घुटने टेकने के बजाय, हर कश्मीरी पंडित को घर वापसी की सम्मानजनक और नीतिपूर्ण योजनाओं पर पुनर्विचार करना चाहिए, जिसकी पृष्ठभूमि अलगाव, भेदभाव व फ़र्क़ करने की नीति पर आधारित न हो.

एक ऐसे सामूहिक भविष्य की कल्पना की जानी चाहिए जहां लोगों का सुरक्षा-भाव अपने आसपास के लोगों और समुदाय की विविधता में निहित हो, न कि उस सैन्य व्यवस्था में जो सत्ता के इशारे पर ज़ुल्म ढाती है, वह सत्ता जिसने लोकतांत्रिक मूल्यों की धज्जियां उड़ा दी हैं. कश्मीरी पंडितों के लिए कोई असीम सुखों वाला घर बाहें फैलाये इंतज़ार नहीं कर रहा, वह भी ऐसे वक़्त में जब उनके मुस्लिम भाई-बहन भारत सरकार का पुरजोर शोषण और औपनिवेश झेल रहे हों.

वापसी की कोई भी योजना कश्मीर के विविध इतिहास, पहचान और पीड़ा को दरकिनार कर नहीं बनायी जा सकती, जिसने गये 70 वर्षों में कश्मीर के समाज की रचना की है. इस कल्पना में ज़रूरी है कि कश्मीरी पंडितों के सर्वाधिक शोषित होने के कथानक को पीछे छोड़ा जाये, जिसका प्रचार मौकापरस्त लोग भारत में हिंदू राष्ट्र और हिंदुत्व की हिंसा को वैधता देने के लिए करते रहे हैं.

घर की यह कल्पना ऐसी सोच में निहित होनी चाहिए जिसमें हर कश्मीरी के लिए सामाजिक और राजनैतिक न्याय सुनिश्चित हो. यदि कश्मीरी पंडित मुसलमान पड़ोसियों से भय का हवाला दे कर अपने लिए पृथक बख़्तरबंद कालोनी की मांग करेंगे तो उन्हें यह भी सोचना पड़ेगा कि वे कश्मीरी मुसलमानों से यह मांग कैसे कर सकते हैं कि वे एक हिंदू बहुल राष्ट्र में शामिल हो जायें, जिसने वर्षों तक संयुक्त राज्य द्वारा मिले आत्मनिर्णय के उनके अधिकार का हनन किया है और आत्मनिर्णय की मांग करने वालों पर यातनाएं की हैं, उन पर ज़ुल्म ढाये हैं और जानें ली हैं.

उन्मादी हिंदुत्ववादी भावनाओं से परे ही एक नये घर की कल्पना संभव है और इस सपने को बुनने का काम आज से ही शुरू होना चाहिए.

(दीप्ति मिस्री यूनिवर्सिटी ऑफ़ कोलोराडो बोल्डर में वीमेन ऐंड जेंडर स्टडीज़ की एसोसिएट प्रोफ़ेसर हैं.
डॉ. मोना भान सायराक्यूस यूनिवर्सिटी में एंथ्रोपोलॉजी और साउथ एशियन स्टडीज़ की एसोसिएट प्रोफ़ेसर हैं. अल जज़ीरा में प्रकाशित इस आलेख का हिंदी अनुवाद शक्ति ने किया है.)

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