कश्मीर: असली मनोवैज्ञानिक अवरोध कंटीली तारों से बना है

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कश्मीरी पंडित और विद्वान, प्रोफेसर सुवीर कौल ने 2017 में ‘ऑफ़ गार्डन्स एंड ग्रेव्स’ नामक किताब लिखी थी जो उनके श्रीनगर के दौरों के जरिये कश्मीर के संघर्ष की चर्चा करती है. कश्मीर में मौजूदा संकट और भारतीय लोकतंत्र पर सत्ता के बढ़ते केंद्रीकरण के मायनों पर उन्होंने अपने इस इंटरव्यू में महत्वपूर्ण विचार रखे हैं.

पार्थो चक्रबर्ती

प्रोफेसर सुवीर कौल एक कश्मीरी पंडित और एक विद्वान हैं जिनकी 2017 में आयी किताब, ‘ऑफ़ गार्डन्स एंड ग्रेव्स’, 2003 से शुरू हुए उनके श्रीनगर के दौरों के संक्षेत्र से कश्मीर के संघर्ष की चर्चा करती है, जिस दौरान उनका परिवार वहाँ अपने घर लौट गया था. प्रोफेसर कौल ने शुरू में अनुच्छेद 370 के निरस्त किये जाने पर इंटरव्यू देने से मना कर दिया था, यह कहते हुए कि वह चाहते थे कि हम मौजूदा और पिछली सरकारों की इस संघर्ष के प्रति ‘लोकतान्त्रिक समाधान ढूंढने की राजनैतिक समझदारी और सहानुभूति’ की असफलता पर ग़ौर करें. मैंने फिर भी ज़ोर दिया क्योंकि उनकी किताब वह करती है जो कई सारे मौजूदा संवाद नहीं कर पा रहे हैं: वह स्थिति की जटिलता के साथ विवाद करती है, अपने दावों को विचारपूर्वक तरीके से पेश करती है, और हमें कश्मीरियों की पीड़ा का पूरी तरह से सामना करने के लिए मजबूर करती है.

यह आखिरी बात आंशिक रूप से संघर्ष के बारे में लिखी गयी कश्मीरी कविताओं का प्रोफ़ेसर कौल द्वारा अनुवाद और विख्यात फोटो जर्नलिस्ट जावेद डार की तस्वीरों से ज़ाहिर होती है. चूंकि प्रोफेसर कौल पेन्सिलवेनिया विश्वविद्यालय में अंग्रेजी के ए.एम.रोसेन्थल प्रोफेसर हैं, कविताओं पर उनकी टिप्पणी, जो बहुत कुछ प्रत्यक्ष करती हैं, विशेष रूप से मार्मिक और पैनी हैं.

वह इस इंटरव्यू में वही ईमानदारी, स्पष्टता और गहराई लाते हैं, जो शोध और अनुभव दोनों से आते हैं, साथ-साथ हमें यह याद दिलाते हुए कि ‘असली पीड़ित वे हैं जो 5 अगस्त से उस विशाल क़ैदखाने में बंद हैं जो अब कश्मीर को बना दिया गया है. यहां पेश है प्रोफेसर कौल का इंटरव्यूः

सवालः प्रोफेसर, जब मैंने अनुच्छेद 370 के उन्मूलन पर आपसे एक इंटरव्यू का अनुरोध किया, तो आपने कहा था कि मेरे लिए इस मुद्दे पर लिखने का यह सबसे अच्छा तरीका नहीं है. क्या आप इस बारे में विस्तार से बता सकते हैं कि आप ऐसा क्यों महसूस करते हैं?

जवाबः मैंने ऐसा इसलिए कहा था क्योंकि, हांलाकि कई पत्रकार और पाठक राजनैतिक मुद्दों की कहानी की शुरुआत के लिए ‘मानवीय पहलू’ का तत्त्व चाहते हैं, मैं नहीं चाहता था कि कश्मीर में होने वाली घटनाओं से मेरे व्यक्तिगत संबंध भारत सरकार की कार्रवाई की चर्चा पर हावी हों, जिसने इस हालिया संकट को जन्म दिया है. हममें से जो कश्मीर से व्यक्तिगत संबंध रखते हैं, वे सरकार द्वारा लागू किए गए घेराबंदी के प्रभाव को दूर से भी महसूस कर रहे हैं, लेकिन असली पीड़ित वे हैं जो 5 अगस्त, 2019 से उस विशाल क़ैदखाने में बंद हैं जो अब कश्मीर को बना दिया गया है. ध्यान वहाँ हो रहे बुनियादी मानव स्वतंत्रता के व्यवस्थित और क्रूर दमन पर होना चाहिए, और उसके बाद वहाँ पैदा हुई राजनीतिक स्थिति के विश्लेषण पर, खासकर कि अनुच्छेद 370 को रद्द करके जम्मू, कश्मीर और लद्दाख का ज़बरदस्ती भारत के साथ “एकीकरण” करने की मोदी-शाह-डोवाल की योजना का. इस कवायद में शामिल संवैधानिक वैधताओं या अवैधताओं की उच्चतम न्यायालय द्वारा जांच की जाएगी, लेकिन इस पर कोई सवाल नहीं है कि मोदी सरकार ने यह जो किया वह इसलिए किया क्योंकि वो (और उनसे पहले की केंद्रीय सरकारें भी) भारतीय सैन्य और अर्धसैनिक उपस्थिति के भारी बोझ से मुक्त होने की कश्मीरियों की इच्छा को हल करने का तरीका नहीं खोज पायी है. आज़ादी के लिए कश्मीरी आंदोलन – मिलिटेंट और नागरिक प्रदर्शनकारी दोनों ही – ने स्पष्ट कर दिया है कि वे क्या चाहते हैं; किसी भी सरकार के पास इस संघर्ष का लोकतांत्रिक समाधान तैयार करने की राजनीतिक समझदारी या सहानुभूति नहीं रही है. और अब जम्मू और कश्मीर राज्य और भारतीय संघ के बीच कानूनी संबंधों को फिर से परिभाषित करने में मोदी सरकार की कार्रवाइयों का असर यह हुआ है कि 1947 के इंस्ट्रूमेंट ऑफ एक्सेशन को रद्द किया गया और इस तरह कश्मीर में भारतीय उपस्थिति को वास्तविक तौर पर अधिग्रहण करार दिया गया, जैसा कि कुछ वकीलों ने तर्क दिया है.

सवाल: यह जानते हुए कि आपका परिवार अभी भी कश्मीर में है, व्यक्तिगत रूप से आपके ऊपर ‘कश्मीर की घेराबंदी’ का क्या असर रहा है? यह अशांति और संकट के पिछले क्षणों की तुलना में कैसा है?

जवाब: मेरे परिवार के सदस्य श्रीनगर में थे, लेकिन एक कज़न भाई श्रीनगर गया और उन्हें (उसके माता-पिता और मेरी बहन) अपने साथ दिल्ली ले आया. वे कश्मीर छोड़ने के लिए मजबूर हुए क्योंकि उनसे संपर्क करने का कोई तरीका नहीं था- क्यूंकि हम एक ऐसे इलाके के पास रहते हैं जो अर्धसैनिक उपस्थिति के खिलाफ अपने प्रतिरोध के लिए जाना जाता है, हमारी लैंडलाइन बहाल नहीं की गयी थी, और सभी मोबाइल फोन और इंटरनेट संपर्क तो बंद हैं ही. अजीब बात है, पर इस बार मुझे ऐसा नहीं लगा कि वे असुरक्षित हैं, हालांकि हमें उन्हें खाने-पीने का सामान और ज़रूरी दवाइयां मिलने की चिंता थी. पहले भी बहुत लंबे समय तक चलने वाले कर्फ्यू और अशांति के दौर रहे हैं, और ऐसे पल आए हैं जब प्रदर्शनकारियों और अर्धसैनिक व पुलिस बलों के बीच सड़क पर होने वाली लड़ाई से जीवन मुश्किल हो गया हो, लेकिन इस बार पाबंदियों का शिकंजा इतना व्याप्त है कि हमारे आस पड़ोस के इलाके निर्जीव बन कर रह गए हैं. जब मेरी मौसी दिल्ली लौटीं और इंटरनेट का इस्तेमाल कर पाईं, उन्होंने एक संक्षिप्त संदेश साझा किया, जो उनकी भावनाओं को पूरी तरह स्पष्ट करता है: “कल रात वापस लौटी। घाटी में घेराबंदी को लेकर दिल टूटा हुआ है, दुखी, गुस्सा और असहाय हूँ.”

लेकिन इस बार मेरा डर सिर्फ कश्मीर में हुई घटनाओं को लेकर नहीं है. जैसे-जैसे मुझे यकीन हो रहा है कि जम्मू और कश्मीर का भारत के साथ “एकीकरण” करने के लिए इस्तेमाल किया गया राजनीतिक और कानूनी साँचा पूरे संविधान ही के अर्ध-संघीय (क़्वाज़ी-फ़ेडरल) ढांचे को बदलने में उपयोग किए जाने के लिए पर्याप्त रूप से लचीला है, वैसे-वैसे मेरा डर बढ़ रहा है. भारतीय राज्य संघ से विशिष्ट रूप से जुड़े विभिन्न राज्यों (उदाहरण के लिए, जो अनुच्छेद 371 के तहत सूचीबद्ध हैं) के साथ अपने रिश्तों को फिर से रचने के अधिकार पर केंद्र खुद ही झूठा दावा कर सकता है. सत्ता का इस तरह का केंद्रीकरण भारत में लोकतंत्र के कामकाज के लिए गंभीर मायने रखता है.

सुवीर कौल की किताब ‘ऑफ़ गार्डन्स एंड ग्रेव्स

सवालः अपनी किताब, ‘ऑफ़ गार्डन्स एंड ग्रेव्स’, में आपने अपनी दोहरी पहचान व्यक्त की है, ‘एक गौरवशाली भारतीय और एक लोकतंत्रवादी’ के तौर पर और एक कश्मीरी पंडित के तौर पर. अनुच्छेद 370 को निरस्त करने का औचित्य साबित करने के लिए नेताओं और सोशल मीडिया पर उनके अनुयायियों ने (कश्मीरी) पंडितों के मुद्दे को उठाया है. आप वर्तमान घटनाओं को कश्मीरी पंडितों और उनकी आशाओं और आकांक्षाओं को कैसे प्रभावित करते देखते हैं?

जवाबः पंडितो का एक बड़ा तबका – लेकिन सब नहीं – अनुच्छेद 370 के उन्मूलन का जश्न मना रहा है. कुछ अब दावा कर रहे हैं कि अनुच्छेद 370 ने जम्मू-कश्मीर की मुस्लिम बहुल आबादी को अल्पसंख्यकों के ऊपर हावी होने दिया और यहां तक कि उनपर अत्याचार करने की भी अनुमति दी, जो कि एक काल्पनिक दावा है, जिसे मैंने इस मौके से पहले कभी भी नहीं सुना था! मेरा मानना है कि केंद्र सरकार की कार्रवाइयों ने उनका अपने घरों में लौटना, यहाँ तक कि कश्मीर लौटना भी बहुत, बहुत कठिन बना दिया है. सच यह है कि जो पंडित घर लौटना चाहते थे, वे पहले ही ऐसा कर चुके हैं. जो नहीं लौटे हैं, उनका लौटने का कोई इरादा नहीं है. उनमें से अधिकांश ने तीन दशकों में, जब से उन्होंने कश्मीर छोड़ा, अपना जीवन कहीं और स्थापित कर लिया है, कश्मीर में अपनी संपत्तियों को बेच या छोड़ दिया है, और अगर वे वापस जाते हैं तो केवल छोटी यात्राओं पर, विशेष रूप से धार्मिक स्थलों पर. उनके बच्चे कश्मीर को घर के रूप में नहीं देखते हैं, और अगर वे ऐसा करते भी हैं, तो क्या वे वास्तव में एक ऐसे कश्मीर में लौटेंगे जो केवल अर्धसैनिक बलों की ताकत से नियंत्रित किया जा रहा है?

पंडितों की अनुपस्थिति ने कश्मीरी जीवन की रचना को बदल दिया है, और उनके नुकसान का शोक वे अकेले नहीं मना रहे हैं. जिन कश्मीरी मुसलमानों को मैं जानता हूँ, जिनमे वह दो पीढ़ियां शामिल हैं जो बिना पंडित दोस्तों और पड़ोसियों के बड़ी हुईं, वह पहचानते हैं कि कितना कुछ खो गया था, और शायद कितना कुछ कभी वापस नहीं आएगा.

मुझे कभी-कभी आश्चर्य होता है कि क्या पंडितों ने (और सरकार ने तक) अनुच्छेद 370 के चले जाने के मायनों को ठीक से सोचा है. उदाहरण के लिए, आज तक दिल्ली विश्वविद्यालय में “कश्मीरी प्रवासियों” के लिए आरक्षित सीटें हैं. अब जब कश्मीर और जम्मू, केंद्र शासित प्रदेश हो गए हैं, क्या पंडितों को अभी भी “प्रवासी” माना जायेगा और क्या ऐसे आरक्षण अब भी मान्य होंगे? यदि अनुच्छेद 35A अब लागू नहीं होता है, और “राज्य के नागरिक” के लिए कोई विशेषाधिकार नहीं होंगे, तो पंडितों को भी शिक्षा और प्रशासन सहित सरकारी नौकरियों के लिए मिले ख़ास पहुँच या अधिकारों से वंचित किया जाएगा, और ऐसी नौकरियां अक्सर पंडितों के जीवन का मूल आधार थीं. वे भी उतना कुछ खो देंगे जितना कि जम्मू या लद्दाख के पूर्व-“राज्य नागरिक” खोएंगे, चाहे वो हिन्दू हों, मुसलमान हों, बौद्ध हों या सिख.

सवालः गृह मंत्री ने अनुच्छेद 370 का कश्मीरियों को भारतीय संघ में शामिल होने से रोकने वाली एक ‘मनोवैज्ञानिक बाधा’ के रूप में उल्लेख किया है. कश्मीरी मानस पर पिछले तीन दशकों के प्रभाव पर आपकी किताब के फोकस को देखते हुए आपकी इस पर क्या प्रतिक्रिया होगी?

जवाबः जिन कश्मीरियों ने भारतीय संघ में भाग लेने से इंकार किया है, उन्होंने अनुच्छेद 370 के कारण ऐसा नहीं किया है, बल्कि इसलिए किया है कि वे आत्मनिर्णय के आदर्श में विश्वास रखते हैं. एक आदर्श जिसे भारत सरकार ने मान्यता दी थी जब उसने यह स्वीकार किया था कि अनुच्छेद 370 भारत और जम्मू-कश्मीर की तत्कालीन रियासत के बीच के संबंध को परिभाषित करेगी जब तक कि पूरे राज्य में एक जनमत संग्रह नहीं किया जा सके. मैं यहां एक और टिपण्णी करूंगा: अगर कश्मीरियों और भारतीय संघ के बीच कोई “मनोवैज्ञानिक बाधा” रही है तो वह एक तरफ कंटीली तारों और कंक्रीट अवरोधों से बनी है, और दूसरी तरफ भारतीय सुरक्षा तंत्र की क्रूर कार्रवाइयों से. कश्मीर में ऐसा कोई भी परिवार नहीं होगा जो किसी ऐसे को नहीं जानता जिन्हे पीटा गया, या अपंग बना दिया गया, या मार डाला गया, या ग़ायब कर दिया गया हो. मानवाधिकार समूहों ने इन यातनाओं पर बहुत गहराई के साथ लिखित प्रमाण इकठ्ठा किया है- उनकी रिपोर्टें उन दैनिक अनुभवों का एक भयानक लेखा हैं, जिन्होंने कश्मीरियों पर बेइंतहा अत्याचार किए हैं और उन्हें पूरी तरह से अलग-थलग कर दिया है.

सवालः आपने अपनी किताब में विकास के विषय पर भी संक्षेप में बात की है. अनुच्छेद 370 को हटाने के लिए मुख्य तर्क यह दिया गया है कि यह कश्मीरी लोगों के विकास और समृद्धि का प्रमुख अवरोधक था. आपके अनुमान में विकास के लिए क्या प्रमुख बाधाएं रही हैं? क्या अनुच्छेद 370 को निरस्त करने से विकास आएगा?

जवाबः मैं नहीं देख पा रहा हूँ कि यह कैसे संभव है. जैसा कि जॉन ड्रेज़ और अन्य अर्थशास्त्रियों ने बताया है, जम्मू-कश्मीर ज़्यादातर प्रमुख विकास सूचकांकों में गुजरात जैसे समृद्ध माने जाने वाले राज्यों से बेहतर है. ड्रेज़ का यह मानना सही है कि ऐसा इसलिए है क्योंकि जम्मू-कश्मीर के अलग संविधान ने 1950 के दशक में बड़े पैमाने पर भूमि सुधारों के लिए अनुमति दी थी (शेख अब्दुल्ला का ‘नया कश्मीर’ घोषणापत्र यहाँ महत्वपूर्ण है). कई भारतीयों में यह गलत अवधारणा है कि जम्मू-कश्मीर को इन वर्षों में अपने हक़ से अधिक मात्रा में केंद्रीय सहायता प्राप्त हो रही है, जो बिल्कुल भी सच नहीं है. इसके अलावा, जब आप ध्यान में लाते हैं कि राज्य को अपनी जलविद्युत् योजनाओं को विकसित करने नहीं दिया गया है, जो राज्य की आय को बढ़ा सकती थी, तो आप को समझ आता है कि भारतीय शैली का “विकास” जम्मू, कश्मीर और लद्दाख के लिए एक धुंधली संभावना है. आपने बिहार और उत्तर प्रदेश के उन दसों हज़ारों मज़दूरों और कारीगरों पर ध्यान दिया होगा, जो साल में आठ महीने कश्मीर आते हैं ताकि वे अपने घर या भारत में अन्य जगहों के मुक़ाबले बेहतर मज़दूरी कमा सकें – ऐसा क्यों होता अगर कश्मीर की अर्थव्यवस्था अनुच्छेद 370 कि वजह से नष्ट होती?

क्या राज्य का बुनियादी ढांचा और विकसित हो सकता है? बेशक, और यह भारतीय संघ में सभी राज्यों के लिए सच है. लेकिन याद रखें कि जम्मू-कश्मीर में ढांचागत विकास – सड़क, पुल, छावनी – सुरक्षा तंत्र की प्राथमिकताओं का पालन करते हैं, जिनमें भारतीय सेना भी शामिल है. इस बात पर आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि सबसे अच्छी सड़कें वे हैं जो सेना को अपने संचालन के लिए चाहिए, और वही उन पर सारी आवाजाही को नियंत्रित करती है। लद्दाख में भी अब यह तेज़ी से सच हो रहा है.

सवालः आपकी किताब कश्मीरी लोगों के अनुभवों तक पहुँचने और उन्हें समझने में कला, विशेष रूप से कविता के महत्व की बात करती है. ये हमें जो सिखा सकती है, उन मायनों में कला के इन रूपों और मानवाधिकार संगठनों और पत्रकारों द्वारा लिखी गयी किताबों और रिपोर्ट्स में क्या अंतर है?

जवाबः मुझे लगता है कि प्राथमिक अंतर यह है कि कला कल्पना को सक्रिय करके अपने पाठकों और दर्शकों को अनुभव और भाव के उन क्षेत्रों में ले जाती है जिन्हे वे आमतौर पर ढूंढ नहीं पाएंगे. वह अविकसित सार्वजनिक और व्यक्तिगत अनुभवों को समझने में मदद करती है, और सबसे शक्तिशाली उदाहरणों में, अपने पाठकों को खोज और अंतर्दृष्टि की शक्ति देती है. इसका यह मतलब नहीं है कि पत्रकारीय लेखन या मानवाधिकार रिपोर्ट इस सब का कोई प्रारूप नहीं कर सकते हैं, लेकिन उनके रूप ज़रूर अलग होंगे, और उदाहरण के तौर पर, उनके उद्देश्य अक्सर किसी उपन्यासकार या कवि की तुलना में ज़्यादा विशिष्ट होते हैं. अपनी किताब में मैंने एक प्रसिद्ध समाचार-फोटोग्राफर जावेद डार की तस्वीरों की एक श्रृंखला प्रकाशित की, और वे मेरे द्वारा अनुदित कविताओं और लिखी गयी टिप्पणी की दृश्यों द्वारा विषमता को उजागर करते हैं. मेरी उम्मीद यह थी कि इसके द्वारा पाठक को गद्य या कविता की तुलना में ज़्यादा स्पष्ट रूप से “देखने” की क्षमता मिलेगी.

सवालः सत्तारूढ़ ताकतों के अनुसार कश्मीर का मुद्दा लंबे समय से चलता आ रहा है जिसे संबोधित करने के लिए पिछली सरकारों ने कुछ भी नहीं किया है. इसलिए वे मौजूदा कदम को एक जटिल समस्या को हल करने की दिशा में आगे बढ़ने का सबसे अच्छा तरीका बता रही हैं- एक तरह से ‘गॉर्डियन गाँठ’ काट रही हैं। क्या निरस्त किए जाने की इस प्रक्रिया को आप समाधान की ओर एक कदम के रूप में देखते हैं?

जवाबः हाँ, ‘गॉर्डियन गाँठ’ – आपको याद होगा कि इस गाँठ को काटने में अलेक्जेंडर की सफलता एशिया में उसकी फतह की शुरुआत थी. वास्तव में इस केंद्र सरकार की हिंदुत्ववादी कल्पना में यह रूपक वही भूमिका अदा करता है: वे अब एक ऐसे राज्य पर फतह और नियंत्रण को औपचारिक रूप दे सकते हैं, जिसकी भारतीय संघ के साथ हुई पूर्ववर्ती कानूनी व्यवस्था का पिछली सरकारों ने सम्मान किया गया था, भले ही उन्होंने अनुच्छेद 370 में कथित रूप से शामिल स्वायत्तता के कई प्रावधानों को खोखला कर दिया था.

सवालः अपने व्यापक पठन में क्या आपको समाधान की ओर बढ़ने के कोई वैकल्पिक रास्ते मिले हैं? क्या सरकार के पास कोई अन्य विकल्प था?

जवाबः यह एक ऐसा सवाल है जिसका मैंने जवाब देने से लगातार इन्कार किया है, क्योंकि इस सवाल को शिक्षाविदों, नौकरशाहों या राजनेताओं से पूछने के बजाय जम्मू-कश्मीर में रहने वाले लोगों से पूछा जाना चाहिए. और हां, विकल्प हमेशा होते हैं, लेकिन आपको उन्हें उन लोगों के साथ चर्चा में विकसित करने की आवश्यकता है जिनका भविष्य दांव पर है.

मीडियम‘ में 30 अगस्त को छपी इस बातचीत का अनुवाद ‘कश्मीर ख़बर‘ के लिए अपूर्वा ने किया है.