चप्पे-चप्पे पर सैनिक, बंद मस्जिदें और चौबीसों घंटे निगरानी: तालाबंदी में कश्मीर के भीतरी हालात

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कश्मीर में हफ्तों तक सूचना और संचार के साधनों के प्रतिबंध के बाद वहां के निवासियों का कहना है कि उनके धार्मिक और मानव अधिकारों का गंभीर उल्लंघन किया गया

सद्दफ़ चौधरी

फोटो:एक कश्मीरी आदमी को रास्ते में रोकते सैनिक (स्त्रोत- पी.ए. इमेजेज़), साभार: ओपन डेमोक्रेसी

ईद-उल-अदहा-साल में मुसलमानों के सबसे बड़े त्योहार के दौरान, श्रीनगर, कश्मीर की सड़कों पर आमतौर पर खचाखच भीड़ और रौनक रहती है, जब लोग आखिरी वक़्त तक त्योहार के लिए खरीदारी में लगे रहते हैं. पर इस साल राज्य के सबसे बड़ा शहर श्रीनगर जैसे प्रेतों का शहर था. दुकानें बंद थीं और बाज़ार सूने थे.

लगभग सभी मस्जिदों पर नमाज़ियों के जाने पर पाबंदी थी और शहर की सबसे बड़ी दो मस्जिदें जामा मस्जिद और आलिया मस्जिद, जहाँ हर साल हज़ारों लोग नमाज़ पढ़ने इकठ्ठा होते हैं, पर ताला लगा था.

एक छात्र, साजिद के अनुसार, “यह बहुत परेशान करने वाला था. हमसे हमारे धार्मिक अधिकारों को भी छीन लिया गया है. यह मेरी छोटी बहन की पहली ईद थी और मुझे खुशी है कि वो इतनी छोटी है कि उसे अंदाज़ा ही नहीं है कि बाहर क्या हो रहा है.”

कुछ दिन पहले, 5 अगस्त को, भारत की राष्ट्रवादी हिन्दू सरकार ने अचानक कश्मीर की स्वायत्ता को रद्द कर दिया था. घोषणा से पहले, अशांति की संभावना को देखते हुए, पूरे इलाके में हज़ारों की तादात में सैनिकों को तैनात कर दिया गया और दर्जनों राजनीतिक नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया. तब से बाहरी दुनिया से कश्मीर को जोड़ने वाले सभी संचार माध्यमों पर पाबंदी लगी हुई है.

ऐसे माहौल में रहने के लिए मजबूर कश्मीरियों के अनुसार “इस भय के माहौल के कारण कश्मीरी अपने ही घरों में कैदियों जैसा महसूस करने लगे हैं.” श्रीनगर में कर्फ्यू सख्ती से लागू है और सड़कों पर कांटेदार तारों का जाल बिछा होने से निवासियों की रोज़मर्रा की ज़िन्दगी भी दूभर हो गयी है.

साजिद के अनुसार, “असलियत यह है कि हम लोग एक पिंजड़े में बंद हैं. वे हमें गिरफ्तार करते हैं. हमारी आवाज़ दबाते हैं. हम अब तक की सबसे गंभीर पाबंदियों का सामना कर रहे हैं. वे हमारा मनोबल तोड़ना चाहते हैं.”

सर पर काली पट्टी बांधे लोग लगातार हमारे हर कदम की निगरानी रखे हुए हैं. हमें इसकी कोई खबर नहीं कि दक्षिण या उत्तरी इलाकों में रह रहे हमारे भाई-बहन किस हालत में हैं.हम सिर्फ दिल्ली में बात कर सकते हैं और घाटी में वापस आते ही, चारों तरफ सिर्फ सन्नाटा है.”

मिर्च के स्प्रे और निगरानी करते ड्रोन्स

कश्मीर के विशेष राज्य के संवैधानिक प्रावधानों को रद्द करके, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कश्मीर की स्वायत्ता को खत्म कर दिया है जो 1947 में राज्य के भारत में विलय की एक शर्त थी. कश्मीर की आज़ादी का फैसला भविष्य में एक जनमत के माध्यम से किया जाना था पर ऐसा कभी न हो सका. अब तक कश्मीर को अपना संविधान और अपने कानून बनाने का अधिकार था. सरकार ने इन अधिकारों को रद्द कर दिया है और पूरे राज्य को सीधे अपने कब्ज़े में कर लिया है.

कर्फ्यू की परवाह न करते हुए, हज़ारों लोगों ने सरकार की इस कार्यवाही का विरोध किया है. घोषणा के बाद से, सरकार-विरोधियों और भारतीय सेना के बीच कई दिनों से लगातार झड़पें जारी हैं. एक कश्मीरी छात्रा सामिया* के अनुसार पेप्पर स्प्रे और जलते टायरों की गंध पूरी घाटी में छायी है.

श्रीनगर के एक पश्चिमी इलाके, बेमिना में, प्रदर्शनकारियों ने एक पूरी सड़क को घेर रखा है. इस सड़क के दोनों ओर भारतीय सेना ने कुछ आदमियों को घेर लिया था तो उन्होंने नदी में कूदकर भागने की कोशिश की. कहा जाता है की एक आदमी की डूबने से मौत हो गयी. एक चश्मदीद गवाह (जिसने अपना नाम बताने से इंकार कर दिया) ने कहा, “मैं समझ सकता हूँ की वे नदी में क्यों कूदे.अगर हम नहीं लड़ेंगे तो कुछ नहीं बचेगा. वे हमारी ज़मीन पर अपना कब्ज़ा कर लेंगे.”

भारतीय अधिकारियों ने कश्मीरियों पर नज़र रखने के लिए अत्यंत आधुनिक तकनीकों को अपनाया हुआ है. श्रीनगर के दक्षिणी इलाके में एक प्रदर्शन में भाग लेने के लिए आलिया से पुलिस ने पूछताछ की थी. आलिया के अनुसार ड्रोन्स द्वारा ली गयी तस्वीरों में उसकी ड्रेस का रंग देखकर उससे पहचाना गया था. बाद में उसको छोड़ दिया गया पर उसका पति अभी भी जेल में है.

रिपोर्टों के अनुसार, अनुच्छेद 370 को रद्द करने के बाद से अब तक 4,000 से ज़्यादा लोगों को गिरफ्तार किया जा चुका है. भारतीय जनसुरक्षा क़ानून के अंतर्गत भारतीय सेना बिना किसी पर्याप्त सबूत के किसी को भी गिरफ्तार कर सकती है. इस प्रावधान की वजह से स्थानीय निवासियों और सरकारी अधिकारियों के बीच तनाव और ज़्यादा बढ़ गया है. कई निवासियों ने कहा कि मोदी सरकार के दमनकारी क़दमों के बावजूद वे अपना विरोध जारी रखेंगे.

किंग्स कॉलेज, लंदन के एक वरिष्ठ प्राध्यापक अदनान नसीमुल्लाह के अनुसार, कश्मीर की तालाबंदी “असाधारण क़ानूनी कार्यप्रणालियों के एक बड़े पुराने इतिहास का ही एक हिस्सा है.” उन्होंने आगे कहा, “जब भी भारत सरकार को लगता है कि उसकी सुरक्षा को खतरा है वह इन क़ानूनी हथियारों का इस्तेमाल कर सकती है और ये (हथियार) मानवीय अधिकारों का उल्लंघन करते हैं.”

लॉकडाउन के शुरू होने के बाद से ही अब तक पूरे राज्य में मोबाइल नेटवर्क बंद हैं पर शायद पहली बार इंटरनेट और लैंडलाइन फ़ोन सेवाओं को भी बंद कर दिया गया है. कश्मीरी निवासी सख्त पुलिस निगरानी में ही अपने परिवारों से संपर्क बना पाए हैं.

सामिया ने कहा कि निवासियों को फ़ोन करने से पहले एक पुलिस स्टेशन में यह लिखित जानकारी देनी पड़ती है कि वे किससे बात करना चाहते हैं और तभी उनको फ़ोन करने कि अनुमति दी जाती है. “मैं ऐसा कभी नहीं चाहूंगी कि मेरा परिवार पुलिस स्टेशन जाए और 30 सेकंड बात करने के लिए छह घंटे तक इंतज़ार करे. और जहाँ उन्हें बताया जाए कि वे क्या कह सकते हैं.” सानिया ने कहा, “मैं नहीं चाहती कि वे कभी भी ऐसा करें, हांलाकि यह सन्नाटा एक सज़ा की तरह है और काफी परेशानी देने वाला है.”

बार-बार पूछे जाने के बावजूद भारतीय अधिकारियों ने कोई भी टिप्पणी करने से इंकार कर दिया.

संचार माध्यमों पर पूरी तरह बंदी होने के कारण कश्मीर में पत्रकार इस त्रासदी के बारे में कुछ नहीं कह पाए हैं. श्रीनगर के एक पत्रकार सफवत ज़रगर ने बताया कि वे भारतीय अधिकारियों द्वारा संचालित ई-मेल के माध्यम से ही संपर्क बनाये हुए हैं और वे सवालों के जवाब नहीं दे सकते. तनाव की शुरुआत के बाद से अबतक पुलिस ने कम से कम दो पत्रकारों को गिरफ्तार किया है. कमिटी फॉर प्रोटेक्शन ऑफ़ जर्नलिस्ट्स (सीपीजे) से जुड़ी आलिया इफ्तिकार के अनुसार भारतीय अधिकारियों द्वारा पत्रकारों का उत्पीड़न उनके “मानवीय अधिकारों का गंभीर उल्लंघन है.”


फोटो:श्रीनगर में विरोध प्रदर्शन में नारे लगाती कश्मीरी महिलाएं (स्त्रोत-पी.ए. इमेजेज़), साभार: ओपन डेमोक्रेसी

मुसलमानों को निशाना बनाने के लिए एक पर्दा

निवासियों की बीच इस बात को लेकर काफी बेचैनी है कि भारतीय सरकार, भारत की एकमात्र मुस्लिम बहुसंख्यक राज्य की जनसँख्या का प्रारूप बदलने कि तैयारी में लगी है. “हमारा मूल डर यह है कि अंततः कश्मीरियों को निकालकर हिन्दुओं को यहाँ बसा दिया जायेगा और इससे कश्मीर की संघर्ष का मूल स्वरुप ही बदल जायेगा”, सामिया ने कहा जो कश्मीर में रहनेवाली एक छात्रा हैं.

इससे पहले गैर-कश्मीरी कश्मीर में ज़मीन नहीं खरीद सकते थे और वहां स्थायी रूप से नहीं बस सकते थे. पर इस राज्य के कानून बनाने के अधिकारों के साथ-साथ इन पाबंदियों को भी अब भारत की केंद्रीय सरकार ने ख़त्म कर दिया है. सरकार का दावा है कि इन बदलावों से कश्मीर में तेज़ी से आर्थिक विकास होगा. पर आलोचकों, जैसे भारतीय लेखक सिद्धार्थ देब, के अनुसार यह दावा महज़ एक दिखावा है.

देब के अनुसार, “मोदी के नेतृत्व में भाजपा सरकार ने आर्थिक विकास कि आड़ में समय-समय पर अपने हिंसक, सांप्रदायिक और अधिनायकवादी एजेंडे को छुपाने की कोशिश की है. भारत में अब यह दूसरी बार सत्ता में आयी हैं और विकास के नाम पर इसके पास दिखाने को कुछ नहीं है, पर लगातार जारी हिंसा को लेकर इसके पास दिखाने को बहुत कुछ है, ख़ास तौर से भारत के विविधता से भरे मुस्लिम समुदाय को निशाना बनाकर.”

कश्मीर में चल रहे मुश्किल हालातों के बीच मोदी सरकार ने असम में भी लगभग 20 लाख लोगों को, जिनमें ज़्यादातर मुसलमान हैं, उनको नागरिकता से वंचित कर दिया है. अधिकारियों का दावा है कि गैर-क़ानूनी अप्रवासन कि वजह से (नागरिकता की) जांच ज़रूरी है पर मानवीय अधिकारों से जुड़े कार्यकर्ताओं का मानना है कि इस प्रक्रिया ने संजातीय बंगाली समुदाय के लोगों की नागरिकता छीन ली है जिन्होंने अपनी पूरी ज़िंदगी भारत में गुज़ारी है.

कैंब्रिज विश्वविद्यालय में रीडर के पद पे पढ़ाने वाली प्रियंवदा गोपाल के अनुसार “(यह) स्पष्ट है कि हिन्दू राष्ट्र कि दिशा में यह पहला औपचारिक कदम है. इसके अलावा, जैसा कि कई लोग पहले ही कह चुके हैं, यह भारत के मुसलमानों के लिए एक संकेत है कि वह दूसरे दर्जे के नागरिक हैं और यहाँ के बहुसंख्यक समाज द्वारा मान्य दायरों में ही रह सकते हैं.”

कश्मीरियों को चिंता है कि अगर हिंदू जन प्रवासन उन्हें अपने राज्य में अल्पसंख्यक बना देता है तो उनकी धार्मिक स्वतंत्रता को दबाया जा सकता है. घाटी के नागरिकों को डर है कि वे अपनी ही मस्जिदों में नमाज़ नहीं पढ़ पाएंगे. श्रीनगर के एक शोध-छात्र मंज़ूर ने याद किया कि जिस रात यह घोषणा हुई तब नमाज़ कि अज़ान हुई थी, पर शायद भविष्य में उसे चुप करा दिया जायेगा.

कश्मीर में बड़े पैमाने पर फैले भय और आतंक के माहौल ने निवासियों का अपने बारे में ही नजरिया बदल दिया है. “आप घाटी कि तरफ देखते हैं और सोचते हैं कि यह अब आपका घर नहीं है”, सामिया ने कहा. “अपने घर को नज़दीक से जानने की अनुभूति अब ख़तम हो गयी है.”

नोट: *कुछ लोगों के नाम उनकी सुरक्षा के लिए बदल दिए गए हैं.

(सद्दफ़ चौधरी का यह लेख ओपन डेमोक्रेसी वेबसाइट पर 12 सितम्बर 2019 को प्रकाशित हुआ था. इसका अनुवाद कश्मीर ख़बर के लिए वृजेन्द्र ने किया है. इसे हमने ओपन डेमोक्रेसी से साभार प्रकाशित किया है)